
बबली सिंह चौहान
गोबिंदपुर बाजार में दुर्गा पूजा की तैयारी, मेरे बचपन की सबसे प्यारी याद है। जब भी मैं उस बाजार से गुजरती थी, तो दूर से ही घास-फूस (बिचाली) से बनी मूर्तियों को देखकर मेरा मन खुशी से भर उठता था। यह इस बात का एहसास दिलाता था कि अब माँ दुर्गा के आने का समय बहुत करीब है। धीरे-धीरे कारीगर उन प्रतिमाओं पर मिट्टी लगाना शुरू करते, और मेरी उत्सुकता बढ़ती जाती। जैसे-जैसे मूर्ति आकार लेती, मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहता था। मेरे लिए यह सिर्फ त्योहार नहीं था, बल्कि नए कपड़ों और नए उमंगों के आने की उम्मीद भी थी।
मेरा घर मंदिर से कुछ ही दूरी पर था, और मैं बार-बार छिपकर माता को निहारने जाती थी। पहले मिट्टी के सूखने का इंतज़ार, फिर उस पर रंग चढ़ना, और अंत में जब माता की आँखों में पुतलियाँ बनाई जातीं, तो लगता था जैसे उनमें जान आ गई हो। जब माता को साड़ी और गहने पहनाए जाते, तो उनका स्वरूप और भी दिव्य हो जाता था। पता नहीं क्यों, माता के साथ मेरा एक अजीब सा रिश्ता बन गया था, एक ऐसी ललक थी जो मुझे बार-बार उनके पास खींच लाती थी।
आज के समय में बहुत कुछ बदल गया है। अब तो आधुनिक मूर्तियां और आकर्षक पंडाल बनते हैं, लेकिन मेरे बचपन के दिनों की सादगी और रौनक का कोई मुकाबला नहीं है। तब पंडाल भी साधारण होते थे, और हम सहेलियां भी साधारण वेशभूषा में ही रहती थीं। उस समय का उत्साह और प्रेम दिल से जुड़ा था। मुझे आज भी वो दिन याद हैं, जब हम सभी मिलकर पंडाल की सजावट में मदद करते थे, और पूजा के दौरान भजन-कीर्तन में डूब जाते थे।
मूर्ति बनने की शुरुआत से लेकर विसर्जन तक का पूरा दृश्य आज भी मेरी आंखों में ताजा है। वह पल जब ढोल की थाप पर माता की प्रतिमा को विसर्जन के लिए ले जाया जाता था, मेरा दिल भारी हो जाता था। मैं घंटों ढोल वालों के पीछे-पीछे तालाब तक जाती थी, और जब माता की प्रतिमा पानी में विलीन हो जाती, तो मेरी आंखों से आंसू रुकते नहीं थे। विसर्जन के बाद, पूरा माहौल अचानक शांत और उदास हो जाता था। अगले कुछ दिनों तक गोबिंदपुर बाजार की गलियों में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा रहता, और मुझे माता की याद हमेशा आती रहती थी।
आज 20 साल बीत गए हैं, और मेरे शहर में बहुत कुछ बदल गया है। NH के अधिग्रहण से हमारा पुराना मंदिर अब छोटा होने लगा है, लेकिन मेरी उम्मीद है कि समाजसेवी इस पर ध्यान देंगे क्योंकि माता की शक्ति बहुत है और उन्हीं के आशीर्वाद से सब बढ़िया हो रहा है। वह दुर्गा पूजा सिर्फ एक त्योहार नहीं थी, बल्कि मेरे बचपन का एक अनमोल हिस्सा थी, जो हमेशा मेरे साथ रहेगा। वह सादगी, वह प्रेम, और माता के प्रति वह अटूट श्रद्धा आज भी मुझे प्रेरित करती है।




